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वैराग्य का जन्म - काल की लीलाएं

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*काल - परमात्मा का आज्ञाकारी सेवक*








जीवों को अनुभव में आने वाला यह संसार सागर पहले भी था और हमेशा रहेगा। यह अनादि है। जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है, वैसे ही यह संसार उत्पन्न होता है और नष्ट होता है। यह चक्र कभी रुकता नहीं।


पर इस संसार सागर को हर जीव अलग-अलग देखता है। मनुष्य को यह भोग की भूमि लगता है, देवता को यह क्रीड़ा स्थल लगता है, और ज्ञानी को यह माया का पर्दा लगता है। भिन्न-भिन्न योनियों में भिन्न-भिन्न प्रतीत होने वाला यही संसार जीव को अपने जाल में फंसाए रखता है।


इस संसार का सबसे बड़ा अटल नियम है - जिसने यहाँ जन्म लिया है, उसका मर जाना तय है। इससे कोई नहीं बच सकता। न राजा, न रंक, न देवता, न दैत्य।


और इस नियम को पूरा करने वाला है - काल।


यह काल अत्यंत भयानक है। इसको किसी पर दया नहीं आती। जैसे एक छोटा बालक गेंद को उठाता है, पटकता है, फिर उठा लेता है, वैसे ही काल बड़े-बड़े ग्रहों और तारों के साथ करता है। वह खेल रहा है। उसके लिए एक चींटी और एक ब्रह्मांड में कोई अंतर नहीं।


संसार में जितने भी प्राणी ऐश्वर्य से पूर्ण हैं, धन से, बल से, बुद्धि से बड़े हैं, वह सब काल के सामने तुच्छ हैं। रावण जैसा विद्वान, हिरण्यकश्यप जैसा बलशाली, इंद्र जैसा ऐश्वर्यवान - सबको काल ने एक तिनके की तरह उड़ा दिया।


काल में ब्रह्मांडों के झुंड के झुंड न जाने कहाँ चले जाते हैं। आज विज्ञान कहता है ब्लैक होल है, वह सब कुछ खा जाता है। हमारे शास्त्रों ने उसे हजारों साल पहले काल कहा है। जहाँ दिशाएं भी दिखाई नहीं देतीं, जहाँ प्रकाश भी लौट कर नहीं आता, वह काल का मुख है। वह देवों को भी अपने मुख में समा लेता है। बड़े-बड़े दैत्यों को हर लेता है। यम को भी समय आने पर उसके पद से निकाल देता है। यम भी काल के अधीन है।


अंतरिक्ष भी उसके भय से थर-थर कांपता है, दूर भागता है। फिर करोड़ों करोड़ ग्रहों में से एक छोटी सी पृथ्वी के जीवों की क्या औकात है? हम किस बात का अहंकार करते हैं?


ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे काल द्वारा नष्ट न किया गया हो। पहाड़ भी घिस जाते हैं, सागर भी सूख जाते हैं, सोना भी मिट्टी बन जाता है। इस काल के लिए अनंत जीवों की पंक्तियां एक पल में नष्ट होने वाली हैं। वह नियत समय तक इंतजार करता है। वह जल्दबाजी नहीं करता। वह परमात्मा की घड़ी देखता है। और जब समय आता है, फिर ऐसा कोई नहीं जिसे वो विलुप्त न कर दे।


संसार की माया में लिप्त जीवों को वह एक भोजन की तरह देखता है। जैसे हम थाली में भोजन परोस कर रखते हैं, वैसे ही माया ने जीवों को काल के सामने परोस कर रखा है।


स्वयं को बड़ा कहने वाले लोग, अहंकार में पड़े हुए जीव, जिन्हें इस पृथ्वी के भोगों में ही सुख दिखता है, जिन्हें लगता है मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरा शरीर हमेशा रहेगा - काल उनकी तरफ खिन्नता से, घृणा से देखता है। वह हंसता है उनकी नादानी पर। और समय आने पर वह उन्हें बच्चों की गेंद की तरह नर्कों की तरफ फेंक देता है। और उनके शरीर और उनके वैभव को खा जाता है। कुछ भी शेष नहीं बचता।


पर...


काल की लीलाएं अमर हैं। वह नाश नहीं होतीं। वह चलती रहती हैं। क्योंकि काल स्वयं नाशवान नहीं है। काल को स्वयं परमात्मा की आज्ञा है। और वह उसका बहुत दिल लगाकर, बड़े चाव से पालन करता है। वह परमात्मा का सबसे ईमानदार सेवक है। वह किसी से रिश्वत नहीं लेता, किसी की सिफारिश नहीं सुनता।


इसीलिए ज्ञानी काल से डरता नहीं, परमात्मा की तरफ दौड़ता है। वह जानता है कि काल शरीर को खाता है, परमात्मा को नहीं। जो परमात्मा को जान लेता है, वह काल को जीत लेता है।











और वही परमात्मा है - भगवान दत्तात्रेय

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